इस्लाम में दुआ करना बहुत बड़ी इबादत माना गया है। दुआ बन्दे को अल्लाह के करीब लाती है, उसकी परेशानियों को दूर करती है और दिल को सुकून देती है। इन्हीं दुआओं में से एक बहुत अहम और मशहूर दुआ है — Dua-e-Qunoot।
यह दुआ खासतौर पर नमाज़-ए-वतिर में पढ़ी जाती है, जो इशा की नमाज़ के बाद अदा की जाती है।बहुत से लोग इस दुआ को पढ़ते हैं, लेकिन उसका सही मतलब, महत्त्व, और कब-कब पढ़ना चाहिए, यह पूरी तरह नहीं जानते। इसलिए आज हम इस लेख में दुआ-ए-क़ुनूत की पूरी जानकारी आसान और साफ हिंदी के अंदर समझेंगे
Dua-e-Qunoot क्या है?
“क़ुनूत” अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है — खुशू, आज़िज़ी, गिड़गिड़ाहट और अल्लाह के सामने झुक जाना।दुआ-ए-क़ुनूत वह दुआ है जो नमाज़ पढ़ने वाला इंसान वतिर की नमाज़ में रुकू से पहले या बाद में पढ़ता है (हज़रत मुहम्मद ﷺ से दोनों तरीके साबित हैं,
लेकिन हनफी मशहब में रुकू से पहले पढ़ी जाती है)।यह दुआ हमें अल्लाह से भलाई माँगना, बुराई से पनाह माँगना, और अच्छे रास्ते पर चलने की तौफीक माँगना सिखाती है।
Dua-e-Qunoot (Arabic)
اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِينُكَ وَنَسْتَغْفِرُكَ، وَنُثْنِي عَلَيْكَ الْخَيْرَ، وَلَا نَكْفُرُكَ، وَنَخْلَعُ وَنَتْرُكُ مَنْ يَفْجُرُكَ.اللَّهُمَّ إِيَّاكَ نَعْبُدُ، وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ، وَإِلَيْكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ.نَرْجُو رَحْمَتَكَ، وَنَخْشَى عَذَابَكَ، إِنَّ عَذَابَكَ بِالْكُفَّارِ مُلْحَقٌ.

Dua-e-Qunoot का हिंदी अनुवाद
हे अल्लाह! हम तुझी से मदद मांगते हैं, तुझी से माफी चाहते हैं,
और हर भलाई की तारीफ़ करते हैं।हम तेरी नेमतों का इंकार नहीं करते
और हम हर उस शख्स से किनारा करते हैं जो तेरी नाफ़रमानी करे।
हे अल्लाह! हम तेरी ही इबादत करते हैं, तेरी ही खातिर नमाज़ और सज्दा करते हैं।
हम तेरी ही तरफ बढ़ते हैं और तेरे ही लिए मेहनत करते हैं।
हम तेरी रहमत की उम्मीद रखते हैं और तेरे अज़ाब से डरते हैं।निस्संदेह,
तेरा अज़ाब काफ़िरों को घेर लेने वाला है।
Dua-e-Qunoot का मतलब (सरल शब्दों में)
- इस दुआ का मतलब है कि
- हम हर काम में अल्लाह से मदद मांगते हैं।
- हम अल्लाह से गुनाहों की माफी चाहते हैं।
- हम अल्लाह की नेमतों को मानते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं।
- हम अल्लाह की नाफ़रमानी करने वालों से दूर रहते हैं।
- हम सिर्फ अल्लाह की इबादत करते हैं।
- हम अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखते हैं और उसके अज़ाब से डरते हैं।
यह दुआ हमें सिखाती है कि एक मोमिन हमेशा अल्लाह पर भरोसा रखे, नमाज़ में एकाग्रता बनाए रखे और अपने दिल को विनम्र रखे।
Dua-e-Qunoot कब पढ़ी जाती है?
यह दुआ विशेष रूप से वित्र की नमाज़ के आखिरी रकअत में पढ़ी जाती है।रुकू से पहले
तरतीब इस प्रकार है:
वित्र के आखिरी रकअत में तकबीर कहने के बाद हाथ बांध कर रुकू से पहले Dua-e-Qunoot पढ़ी जाती है।
Dua-e-Qunoot क्यों जरूरी है?
दुआ-ए-कुनूत ईमान को मजबूत करती है और अल्लाह की मदद हासिल करने का एक तरीका है।इसे पढ़ने से दिल में तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा), शुक्रगुज़ारी और अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा होता है।
इसके फायदे:
दिल को सुकून मिलता हैगुनाहों की माफी मिलती हैमुश्किलों से नजात मिलती हैनेकी की तरफ रागेब करता हैअल्लाह से क़ुरबत (निकटता) बढ़ती है
दुआ-ए-क़ुनूत कैसे याद करें? (आसान तरीका)
1. रोज़ाना वतिर में पढ़ें रोज़ पढ़ने से 7–10 दिनों में आसानी से याद हो जाती है।
2. लाइन-वाइज याद करेंइसे 4 हिस्सों में बाँटकर पढ़ें,
जैसे:1. اللهم انا نستعينك…2. اللهم اياك نعبد…3. نرجو رحمتك…4. ان عذابك…3.
मोबाइल पर आवाज़ सुनेंदुआ को बार-बार सुनना याद करने का सबसे तेज़ तरीका है।
4. अर्थ समझकर पढ़ेंमतलब समझने से दिमाग जल्दी पकड़ता है और भूलने का डर नहीं रहता।
नतीजा
Dua-e-Qunoot एक खूबसूरत और असरदार दुआ है। यह हमें अल्लाह का शुक्रगुज़ार बनाती है और उसकी रहमत पर भरोसा करना सिखाती है। हर मुसलमान को इसे याद कर लेना चाहिए और वित्र की नमाज़ में इसे ईमानदारी से पढ़ना चाहिए।
اऔर जानकारी के लिए ये भी पढ़ें


