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मेहनत के बाद भी रोज़ी नहीं बढ़ रही

मेहनत के बाद भी रोज़ी नहीं बढ़ रही? अल्लाह की ये बात दिल से सुनिए

मेहनत के बाद भी रोज़ी नहीं बढ़ रही — यह सवाल आज लाखों लोगों के दिल में है। कभी-कभी ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर आ जाती है जहाँ इंसान पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है, दिन-रात एक करता है, फिर भी जब महीने के आख़िर में हिसाब लगाता है तो दिल बैठ-सा जाता है।

“इतनी कोशिशों के बाद भी मेरी रोज़ी में बरकत क्यों नहीं हो रही?”

अगर यह सवाल आपके दिल में भी उठता है, अगर आपको लगता है कि आपकी मेहनत का पूरा फल नहीं मिल रहा, तो यक़ीन मानिए — आप अकेले नहीं हैं।

आज लाखों लोग इसी परेशानी से गुज़र रहे हैं। और यह सवाल उठना ग़लत भी नहीं है, क्योंकि अल्लाह ने इंसान को सोचने और समझने वाला बनाया है।


रोज़ी की तंगी सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं होती

अक्सर हम रोज़ी को सिर्फ़ पैसों से जोड़ देते हैं। हमें लगता है कि अगर पैसे ज़्यादा हो जाएँ, तो सारी परेशानियाँ अपने-आप खत्म हो जाएँगी।

लेकिन हक़ीक़त यह है कि रोज़ी सिर्फ़ नोटों का नाम नहीं है। रोज़ी में शामिल होती है —

  • दिल का सुकून
  • घर का चैन
  • रिश्तों की मिठास
  • मेहनत में बरकत
  • और अल्लाह की रहमत

कई बार इंसान कम कमाता है, लेकिन फिर भी खुश रहता है। और कई बार बहुत ज़्यादा कमाता है, फिर भी बेचैन रहता है।

यही फर्क़ बरकत का होता है।

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जब पैसा आता है लेकिन टिकता नहीं

बहुत से लोग कहते हैं — “कमाई तो हो रही है, लेकिन पैसा हाथ में रुकता ही नहीं।”

कभी अचानक बीमारी आ जाती है, कभी कोई ज़रूरी खर्च निकल आता है, कभी नुकसान हो जाता है।

और इंसान सोचता है — “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”

असल में यह सवाल अल्लाह से नाराज़गी का नहीं, बल्कि अल्लाह को समझने का दरवाज़ा होता है।


रोज़ी की तंगी का सबसे बड़ा कारण

यह बात बहुत ध्यान से समझने की ज़रूरत है।

रोज़ी की तंगी का सबसे बड़ा कारण अक्सर बाहर की हालत नहीं होती, बल्कि हमारे दिल की हालत होती है।

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सबसे बड़ी वजह है — अल्लाह पर भरोसा कम और फिक्र ज़्यादा।

हम नमाज़ पढ़ते हैं, दुआ भी करते हैं, मेहनत भी करते हैं।

लेकिन दिल के किसी कोने में डर बैठा रहता है —

  • अगर कल काम नहीं मिला तो?
  • अगर नुकसान हो गया तो?
  • अगर हालात और बिगड़ गए तो?

यह डर इंसान को अंदर से तोड़ देता है और धीरे-धीरे बरकत को कम कर देता है।

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भरोसा ज़ुबान से नहीं, दिल से होता है

बहुत लोग कहते हैं — “मैं तो अल्लाह पर पूरा भरोसा करता हूँ।”

लेकिन जब थोड़ी-सी परेशानी आती है, तो सबसे पहले घबराहट शुरू हो जाती है।

असल भरोसा वह होता है जो मुश्किल वक़्त में भी दिल को संभाल कर रखे।

وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ

“जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी हो जाता है।” (सूरह तलाक़ : 3)

यह आयत सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि ज़िंदगी में उतारने के लिए है।

मेहनत के बाद भी रोज़ी नहीं बढ़ रही

हम रोज़ अनजाने में कौन-सी गलतियाँ कर देते हैं?

  • हर वक्त शिकायत करते रहना
  • छोटी-छोटी नेमतों को नज़रअंदाज़ करना
  • रोज़ी को सिर्फ़ अपनी मेहनत से जोड़ देना
  • अल्लाह से ज़्यादा लोगों पर भरोसा करना

ये गलतियाँ किसी एक बड़े गुनाह से नहीं, बल्कि रोज़ की छोटी आदतों से बनती हैं और धीरे-धीरे सुकून छीन लेती हैं।


अल्लाह रोज़ी क्यों रोकता है?

यह सवाल बहुत से लोग मन ही मन पूछते हैं, लेकिन बोल नहीं पाते।

याद रखिए — अल्लाह कभी किसी पर ज़ुल्म नहीं करता।

कभी-कभी अल्लाह रोज़ी इसलिए रोकता है क्योंकि —

  • वह बंदे को अपनी तरफ़ लौटाना चाहता है
  • वह उसे सब्र सिखाना चाहता है
  • वह उसे शुक्र की क़ीमत समझाना चाहता है

यह सज़ा नहीं होती, यह तर्बियत होती है।

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रोज़ी में बरकत कैसे वापस आए?

1. शुक्र की आदत डालिए
जो आपके पास है, उसी पर दिल से शुक्र कीजिए।

2. दुआ को मजबूरी नहीं, यक़ीन बनाइए
दुआ ऐसे कीजिए जैसे अल्लाह आपको अभी सुन रहा हो।

3. हलाल पर सख़्ती कीजिए
थोड़ा हलाल, ज़्यादा हराम से बेहतर होता है।

4. शिकायत लोगों से नहीं, अल्लाह से कीजिए
अल्लाह दिल की आवाज़ सुनता है।


सब्र का फल हमेशा मीठा होता है

सब्र का मतलब यह नहीं कि कोशिश छोड़ दी जाए।

सब्र का मतलब है — कोशिश के साथ दिल को अल्लाह से जोड़े रखना।

अल्लाह कभी भी किसी की मेहनत ज़ाया नहीं करता।


एक छोटी-सी दुआ

या अल्लाह!
हमारी रोज़ी में बरकत अता फ़रमा,
हमारे दिलों से डर निकाल दे,
और हमें तुझ पर पूरा भरोसा नसीब फ़रमा।
आमीन।

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आख़िरी बात

अगर आज आपकी रोज़ी तंग है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह आपसे नाराज़ है।

अक्सर इसका मतलब होता है — अल्लाह आपको और बेहतर देना चाहता है, लेकिन सही वक़्त पर।

रोज़ी देर से मिल सकती है, लेकिन अल्लाह की रहमत कभी खत्म नहीं होती।

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