बीमारी जब किसी औरत को घेर लेती है, तो सिर्फ शरीर नहीं थकता, मन भी कमजोर हो जाता है। दर्द, कमजोरी, ऑपरेशन, प्रेग्नेंसी की परेशानी या लंबे इलाज के दौरान सबसे बड़ा सवाल यही होता है – “क्या मैं इस हालत में नमाज़ पढ़ सकती हूँ?”
कई औरतें डर की वजह से नमाज़ छोड़ देती हैं कि कहीं गलती न हो जाए। जबकि सच्चाई यह है कि इस्लाम आसानी का दीन है। यहाँ इबादत बोझ नहीं, बल्कि राहत है। इस लेख में हम बिल्कुल सरल, मानवीय और भरोसेमंद भाषा में समझेंगे कि औरत बीमारी में नमाज़ कैसे पढ़े, किन हालात में कौन-सा तरीका सही है और किन गलतफहमियों से बचना चाहिए।
Islam Ka Basic Rule – Namaz Farz Hai, Tareeqa Badalta Hai
इस्लाम का साफ़ उसूल है:
- नमाज़ हर हाल में फ़र्ज़ है, जब तक होश और समझ कायम हो
- तरीका हालात के हिसाब से बदल जाता है
अल्लाह तआला किसी बंदी पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालते। इसलिए बीमारी में पढ़ी गई नमाज़ भी पूरी और क़बूल होती है।
Pehla Sawal – Kya Har Bimari Mein Namaz Padhna Zaroori Hai?
जवाब है: हाँ। हर बीमारी में नमाज़ पढ़नी होती है, सिवाय इन हालात के:
- हैज़ (मासिक धर्म)
- निफ़ास (डिलीवरी के बाद का खून)
- पूरी बेहोशी या दिमाग का काम न करना
इसके अलावा बुखार, दर्द, फ्रैक्चर, ऑपरेशन, BP, शुगर, कमजोरी – इन सब में नमाज़ माफ़ नहीं होती।

Khade Hokar Namaz – Agar Thodi Taqat Ho
अगर औरत:
- थोड़ी देर खड़ी हो सकती है
- सहारे से खड़ी रह सकती है
- खड़े होने से नुकसान नहीं होता
तो खड़े होकर नमाज़ पढ़े।
अगर खड़े रहने से चक्कर आए या गिरने का डर हो, तो खड़ा होना ज़रूरी नहीं।
Baith Kar Namaz – Sabse Zyada Asaan Tareeqa
अगर खड़ा होना मुश्किल हो लेकिन बैठा जा सकता हो, तो बैठकर नमाज़ पढ़ना बिल्कुल जायज़ है।
Baith Kar Namaz Ka Tareeqa
- ज़मीन, बेड या कुर्सी पर बैठ सकती हैं
- क़ियाम की जगह बैठकर क़िराअत करें
Ruku Aur Sajda
- रुकू के लिए थोड़ा झुकें
- सजदे के लिए रुकू से ज़्यादा झुकें
अगर सजदा ज़मीन पर करना मुमकिन न हो, तो इशारे से सजदा करें।
Let Kar Namaz – Jab Baithna Bhi Mushkil Ho
अगर औरत:
- कमर या रीढ़ के दर्द से परेशान हो
- ऑपरेशन के बाद उठना मना हो
- बहुत ज़्यादा कमजोरी हो
तो लेटकर नमाज़ पढ़ सकती है।
Let Kar Namaz Ka Tareeqa
- दाईं करवट लेटना बेहतर है
- मुमकिन हो तो क़िब्ला की तरफ़ मुँह रखें
- सिर के इशारे से रुकू और सजदा करें
अगर करवट संभव न हो, तो पीठ के बल लेटकर भी नमाज़ पढ़ सकती हैं।
Ishare Se Namaz – Jab Jism Bilkul Saath Na De
अगर औरत न खड़ी हो सके, न बैठ सके और न लेटकर झुक सके, तो:
- सिर्फ सिर या आँखों के इशारे से नमाज़ पढ़े
इसमें:
- दिल में नीयत
- ज़ुबान से क़िराअत (अगर बोल सकती हों)
- रुकू के लिए हल्का इशारा
- सजदे के लिए उससे थोड़ा ज़्यादा इशारा
यह नमाज़ भी अल्लाह के यहाँ पूरी मानी जाती है।
Wuzu Na Ho To Kya Kare – Tayammum Ka Rasta
अगर पानी से नुकसान होता हो, डॉक्टर ने मना किया हो या ज़ख्म हों, तो तयम्मुम करना जायज़ है।
Tayammum Kab Kare
- पानी मौजूद हो लेकिन इस्तेमाल नुकसानदेह हो
- या पानी तक पहुँचना मुमकिन न हो
तयम्मुम से पढ़ी गई नमाज़ बिल्कुल सही होती है।
Kapde Aur Safai – Majboori Ko Samjha Gaya Hai
अगर कपड़े पूरी तरह साफ़ न हों या बेड पर दवा या पेशाब लगा हो:
- जितनी सफ़ाई मुमकिन हो, उतनी करें
- पूरी सफ़ाई न हो पाए, तो भी नमाज़ पढ़ लें
अल्लाह नीयत और कोशिश को देखता है।
Bimari Mein Qaza Namaz – Kab Zaroori Hai
अगर औरत होश में थी और इशारे से भी नमाज़ पढ़ सकती थी, फिर भी जानबूझकर छोड़ दी, तो क़ज़ा करनी होगी।
लेकिन पूरी बेहोशी की हालत में क़ज़ा ज़रूरी नहीं।
Aurat Ke Liye Khaas Baat – Haiz Aur Nifas
- हैज़ और निफ़ास में नमाज़ माफ़ है
- इन दिनों की नमाज़ की क़ज़ा नहीं होती
- बीमारी के खून और हैज़ के खून में फर्क समझना ज़रूरी है
Common Galat Fahmiyan
- बीमारी में नमाज़ छोड़ सकते हैं – गलत
- लेटकर पढ़ी नमाज़ अधूरी होती है – गलत
- वुज़ू न हो तो नमाज़ नहीं – गलत
सही बात यह है कि नमाज़ हर हाल में होती है, तरीका आसान हो जाता है।
Conclusion – Allah Niyat Dekhta Hai
बीमारी में पढ़ी गई नमाज़ अल्लाह के यहाँ बहुत क़ीमती होती है। इस्लाम ने औरत के लिए हर हालत का हल रखा है, ताकि कोई भी नमाज़ से दूर न हो।
याद रखें:
“नमाज़ छोड़ना हल नहीं, तरीका बदलना हल है।”
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