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Islam Me New Year Manana Kaisa Hai?

Islam Me New Year Manana Kaisa Hai? Quran Aur Hadith Ki Roshni Me

31 दिसंबर की रात और 1 जनवरी का दिन आते ही हर जगह “हैप्पी न्यू ईयर” के संदेश दिखाई देने लगते हैं। टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया और दोस्तों के बीच नए साल को लेकर बातचीत शुरू हो जाती है। ऐसे समय में बहुत से मुसलमानों के दिल में यह सवाल पैदा होता है कि इस्लाम में न्यू ईयर मनाना कैसा है? क्या 1 जनवरी को मनाना जायज़ है या नहीं?

इस लेख का उद्देश्य किसी को गलत ठहराना या डर पैदा करना नहीं है, बल्कि इस्लाम की बात को नरम, संतुलित और समझदारी भरे अंदाज़ में पेश करना है, ताकि हर मुसलमान अपनी नीयत और समझ के अनुसार सही फैसला कर सके।

न्यू ईयर का मतलब क्या होता है?

न्यू ईयर का मतलब केवल इतना होता है कि एक साल पूरा हो गया और नया साल शुरू हो रहा है। 1 जनवरी को दुनिया के कई देशों में नया साल इसलिए माना जाता है, क्योंकि वहाँ ग्रेगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है।

इस्लाम का अपना अलग कैलेंडर है, जिसे हिजरी केलेंडर कहा जाता है, जिसकी शुरुआत मुहर्रम के महीने से होती है। इसलिए यह बात बिल्कुल साफ है कि 1 जनवरी इस्लाम का धार्मिक नया साल नहीं है।

इस्लाम में त्योहार मनाने का उसूल

इस्लाम में धार्मिक त्योहार बहुत सीमित हैं। नबी ﷺ ने मुसलमानों को केवल दो बड़े त्योहार दिए हैं:

  • ईद-उल-फ़ित्र
  • ईद-उल-अज़हा

इनके अलावा किसी और दिन को धार्मिक त्योहार बनाना इस्लाम का तरीका नहीं है। इसी कारण 1 जनवरी के दिन कोई विशेष नमाज़, इबादत या त्योहार इस्लाम में तय नहीं किया गया।

Islam Me New Year Manana Kaisa Hai?

क़ुरआन की रौशनी में न्यू ईयर

क़ुरआन हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि समय अल्लाह की एक बड़ी नेमत है। दिन और रात का आना-जाना, महीनों और सालों का बदलना, यह सब अल्लाह की कुदरत के निशान हैं।

क़ुरआन के अर्थ से यह बात समझ में आती है कि हर नया दिन और हर नया साल इंसान को अपनी ज़िंदगी पर सोचने का मौका देता है। इस्लाम में नए साल को शोर-शराबे से ज़्यादा, आत्म-सुधार और बेहतर बनने का अवसर माना गया है।

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हदीस की रौशनी में समझ

नबी ﷺ ने मुसलमानों को यह शिक्षा दी है कि वे अपनी पहचान और अपने दीन पर मज़बूती से क़ायम रहें। इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया से कट जाएँ, बल्कि यह कि गलत कामों और गुनाहों से दूर रहें।

इस्लाम हमें यह सिखाता है कि हर नई चीज़ को बिना सोचे-समझे अपनाना सही नहीं होता। अगर कोई काम गुनाह, बे-हयाई या अल्लाह की नाराज़गी से जुड़ा हो, तो उससे दूर रहना ही बेहतर है।

क्या इस्लाम में न्यू ईयर मनाना हराम है?

यह सवाल बहुत आम है और इसका जवाब संतुलन के साथ समझना ज़रूरी है।

अगर कोई मुसलमान केवल इतना समझता है कि एक साल बीत गया और नया साल शुरू हो रहा है, और इस मौके पर वह अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने का इरादा करता है, तो इस पर बहुत से विद्वानों ने सख़्ती नहीं की है।

लेकिन अगर न्यू ईयर मनाने का मतलब हो:

  • शराब या नशा
  • नाच-गाना
  • बे-हयाई
  • नमाज़ छोड़ देना
  • गुनाह को खुशी का रूप देना

तो ऐसे काम इस्लाम में किसी भी दिन जायज़ नहीं हैं, चाहे वह न्यू ईयर हो या कोई और दिन।

असल समस्या तारीख नहीं, अमल है

इस्लाम में असली समस्या किसी दिन या तारीख की नहीं, बल्कि इंसान के अमल की होती है। अगर कोई 1 जनवरी को फ़ज्र की नमाज़ छोड़ देता है या पूरी रात गलत कामों में गुज़ार देता है, तो गलती दिन की नहीं बल्कि सोच की होती है।

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एक मुसलमान को न्यू ईयर कैसे देखना चाहिए?

एक मुसलमान के लिए हर नया दिन यह सवाल लेकर आता है: मैं आज अल्लाह को कैसे राज़ी कर सकता हूँ?

इसलिए 1 जनवरी के दिन:

  • अपनी नमाज़ों का आत्म-मूल्यांकन करें
  • पिछले साल की गलतियों पर विचार करें
  • अल्लाह से सच्चे दिल से तौबा करें
  • बेहतर इंसान बनने का संकल्प लें

क्या न्यू ईयर पर दुआ करना सही है?

दुआ करना हर दिन और हर समय अच्छा काम है। अगर कोई व्यक्ति 1 जनवरी को अल्लाह से यह दुआ करता है कि वह उसे सही रास्ते पर रखे, उसकी नमाज़ बेहतर करे और उसकी ज़िंदगी को पाक-साफ़ बनाए, तो यह बहुत अच्छी बात है।

इस्लामिक न्यू ईयर और ग्रेगोरियन न्यू ईयर में अंतर

इस्लामिक नया साल मुहर्रम से शुरू होता है, जिसका धार्मिक महत्व है। जबकि 1 जनवरी केवल एक दुनियावी कैलेंडर की शुरुआत है। इस्लाम हमें सिखाता है कि धार्मिक मामलों में इस्लामी उसूलों को अपनाया जाए और दुनियावी मामलों में समझदारी रखी जाए।

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दूसरों के साथ व्यवहार कैसा होना चाहिए?

अगर कोई व्यक्ति न्यू ईयर की शुभकामनाएँ देता है, तो गुस्सा करना, लड़ाई करना या अपमान करना इस्लाम का तरीका नहीं है। इस्लाम हमें नरमी, अच्छे आचरण और सब्र की शिक्षा देता है।

निष्कर्ष

इस्लाम में 1 जनवरी को कोई धार्मिक त्योहार नहीं है। न्यू ईयर मनाना न फ़र्ज़ है और न सुन्नत। गुनाह के साथ किसी भी दिन जश्न मनाना जायज़ नहीं है। सबसे बेहतर तरीका यह है कि नए साल को अपनी ज़िंदगी सुधारने का अवसर बनाया जाए।

इस्लाम तारीख नहीं देखता, अमल देखता है।

आख़िरी बात

अगर पिछले साल हमसे कोई कमी रह गई हो, तो नया साल अल्लाह की तरफ़ लौटने का मौका है। शोर और गुनाह के बजाय, न्यू ईयर को सोच, तौबा और सुधार का दिन बनाइए। यही इस्लाम की खूबसूरती है।

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