रमज़ान का महीना इबादत, सब्र और तक़वा का महीना है। इस पाक महीने में हर रोज़ेदार चाहता है कि उसका रोज़ा सिर्फ रखा हुआ न हो, बल्कि क़बूल भी हो। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि बहुत से लोग रोज़ा रखते हुए कुछ ऐसी छोटी आदतें जारी रखते हैं, जिनके बारे में उन्हें लगता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
चिंगम चबाना उन्हीं आदतों में से एक है।
बहुत से लोग रोज़ा की हालत में सोचते हैं:
- “मैंने तो कुछ खाया ही नहीं”
- “ये तो बस मुँह फ्रेश करने के लिए है”
- “इसमें तो कोई स्वाद भी नहीं”
- “इससे रोज़ा कैसे टूटेगा?”
लेकिन हक़ीक़त जानकर आप खुद चौंक जाएंगे।
रोज़ा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है
सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि रोज़ा सिर्फ खाने-पीने से रुकने का नाम नहीं है।
रोज़ा का असली मतलब है:
- अल्लाह के हुक्म पर खुद को रोकना
- हर उस चीज़ से बचना जो रोज़े की पाकीज़गी को नुकसान पहुँचाए
- शक वाली चीज़ों से भी दूरी बनाना
यही वजह है कि इस्लाम में रोज़ा आँख, कान, ज़ुबान और पेट — सबका रोज़ा होता है।
रोज़ा की हालत में लोग चिंगम क्यों चबाते हैं?
रोज़ेदार लोग चिंगम चबाने के पीछे अलग-अलग दलीलें देते हैं:
- मुँह सूख जाता है
- बदबू आती है
- दिमाग़ हल्का लगता है
- पुरानी आदत है
- “बिना स्वाद वाली है”
लेकिन सवाल ये है:
क्या दलील से रोज़ा सही हो जाता है?
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असली सवाल: क्या रोज़ा में चिंगम चबाना गुनाह है?
इस सवाल का जवाब सीधा “हाँ” या “नहीं” नहीं है, बल्कि हालत पर निर्भर करता है।
और यही बात ज़्यादातर लोग नहीं जानते।
1️⃣ स्वाद वाली चिंगम: रोज़ा तोड़ने वाली और नाजायज़
अगर चिंगम में:
- मीठा स्वाद है
- फ्लेवर है
- खुशबू है
- रंग है
तो इसमें कोई शक नहीं:
👉 रोज़ा टूट जाता है
👉 यह हराम के क़रीब है
👉 जानबूझकर करने पर गुनाह भी है
क्योंकि:
- चिंगम का स्वाद लार में घुलता है
- लार हलक से नीचे जाती है
- यानी कुछ न कुछ अंदर गया
और रोज़े में जानबूझकर कुछ भी अंदर जाना रोज़ा तोड़ देता है।
2️⃣ बिना स्वाद वाली चिंगम: यहाँ से मामला खतरनाक हो जाता है
अब आते हैं सबसे ज़्यादा कन्फ्यूजन वाली बात पर।
कई लोग कहते हैं:
“मेरी चिंगम में कोई स्वाद नहीं”
लेकिन सच यह है कि:
- आज के ज़माने में 100% बिना स्वाद वाली चिंगम मिलना बहुत मुश्किल है
- उसमें केमिकल, मिठास और असर जरूर होता है
- चबाने से लार ज्यादा बनती है
- लार बार-बार निगली जाती है
इसी वजह से ज़्यादातर उलेमा कहते हैं:
👉 रोज़ा में चिंगम चबाना नाजायज़ है
👉 भले ही उसका स्वाद महसूस न हो
फिक़्ह की नज़र में चिंगम का हुक्म
इस्लामी फिक़्ह के मुताबिक:
- जो चीज़ मुँह में डालकर चबाई जाए
- जिससे लार बने
- और लार निगली जाए
तो वह रोज़े की रूह के खिलाफ है।
इसी वजह से:
- हनफ़ी उलेमा इसे मकरूह-ए-तहरीमी कहते हैं
- यानी ऐसा काम जिससे बचना ज़रूरी है
“मैंने कुछ निगला नहीं” — यह सबसे बड़ा धोखा है
बहुत से लोग कहते हैं:
“मैंने तो कुछ निगला ही नहीं”
लेकिन सच्चाई यह है:
- लार को पूरी तरह रोकना इंसान के बस में नहीं
- चिंगम चबाने से लार ज़्यादा बनती है
- लार निगलना मजबूरी बन जाता है
और यही वजह रोज़े को खतरे में डाल देती है।
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क्या भूलकर चिंगम चबाने से रोज़ा टूट जाता है?
अगर:
- आपने भूलकर एक-दो बार चबा लिया
- तुरंत याद आ गया
- फौरन थूक दिया
तो इंशाअल्लाह रोज़ा बच सकता है।
लेकिन:
- जानबूझकर
- पूरे समय
- आदत की वजह से
तो रोज़ा खतरे में पड़ जाता है।
रोज़ा सिर्फ फिक़्ह का नहीं, तक़वा का मामला है
मान लीजिए:
- कोई फतवा आपको छूट भी दे दे
- लेकिन दिल खुद गवाही दे रहा है कि ये सही नहीं
तो मुसलमान वही करता है जो अल्लाह को ज़्यादा पसंद हो।
रमज़ान में:
- शक से बचना
- खुद को रोकना
- अल्लाह के लिए आदत छोड़ना
यही असली कामयाबी है।
रोज़ा में मुँह की बदबू का क्या?
कुछ लोग चिंगम इसलिए चबाते हैं कि:
- मुँह से बदबू आती है
लेकिन याद रखिए:
“रोज़ेदार के मुँह की बदबू अल्लाह के नज़दीक कस्तूरी से बेहतर है।”
यह बदबू शर्म की नहीं, इबादत की निशानी है।
बेहतर विकल्प क्या हैं?
अगर आपको परेशानी होती है, तो ये काम कर सकते हैं:
- सेहरी में अच्छे से मिस्वाक करें
- जुबान साफ करें
- इफ्तार के बाद मुँह अच्छी तरह साफ रखें
- दिन में बेवजह मुँह में कुछ न डालें
आख़िरी और सबसे ज़रूरी बात
अगर आप सच में चाहते हैं कि:
- रोज़ा सिर्फ रखा हुआ न हो
- बल्कि अल्लाह के यहाँ क़बूल भी हो
तो:
👉 चिंगम से दूर रहें
👉 शक वाली चीज़ों से बचें
👉 रोज़े की हिफ़ाज़त करें
क्योंकि:
रोज़ा सिर्फ एक दिन की भूख नहीं, पूरी ज़िंदगी की ट्रेनिंग है।
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