इस्लाम औरत को इज़्ज़त, सहूलत और रहमत देने वाला दीन है। लेकिन जब औरत नापाक हालत (हैज़ या निफ़ास) में होती है, तो अक्सर वह अपने आपको इबादत से दूर समझने लगती है। कई बार समाज और घर के लोग भी उसे यह एहसास दिला देते हैं कि “अब तुम कुछ नहीं कर सकतीं।”
हक़ीक़त यह है कि
👉 नापाक हालत गुनाह नहीं
👉 और इस हालत में भी इबादत के बहुत से रास्ते खुले होते हैं
इस विस्तृत गाइड में हम पूरी तफ़सील से जानेंगे कि नापाक हालत में औरत क्या-क्या इबादत कर सकती है, क्या नहीं कर सकती, और कैसे इस समय को भी सवाब वाला बनाया जा सकता है।
इस्लाम में नापाकी का सही मतलब
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि इस्लाम में “नापाकी” का मतलब गुनहगार होना नहीं है।
अल्लाह तआला ने औरत के शरीर को जिस तरह बनाया है, उसी का हिस्सा है:
हैज़ (Periods)
हर महीने आने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया।
निफ़ास
बच्चे की पैदाइश के बाद आने वाला खून।
ये दोनों हालात अल्लाह की मर्ज़ी से होते हैं।
इसमें औरत की कोई गलती नहीं होती।
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है:
لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا
“अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता।”
(सूरह अल-बक़रा)

नापाक हालत में मना की गई इबादतें
इस्लाम ने औरत पर बोझ नहीं डाला बल्कि आसानी दी है। इसलिए कुछ इबादतों से उसे रोक दिया गया है:
- पाँच वक्त की नमाज़
- रोज़ा
- क़ुरआन शरीफ़ को छूकर पढ़ना
- सज्दा-ए-तिलावत
- मस्जिद में ठहरना
यह रोक रहमत है, सज़ा नहीं।
क्या नापाक हालत में सवाब नहीं मिलता?
यह सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है।
रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“आमाल का दारोमदार नीयत पर है।”
अगर औरत का दिल अल्लाह की तरफ़ जुड़ा हुआ है, तो वह नापाक हालत में भी सवाब कमा सकती है।
नापाक हालत में औरत के लिए जायज़ इबादतें
अब उन इबादतों को विस्तार से समझते हैं जो नापाक हालत में भी जायज़ हैं।
1. दुआ करना
दुआ पर कोई पाबंदी नहीं है।
आप दुआ कर सकती हैं:
- अपने गुनाहों की माफ़ी
- माँ-बाप के लिए
- औलाद के लिए
- रिज़्क़ और सेहत के लिए
Arabic Dua:
رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ
2. ज़िक्र-ए-इलाही
ज़िक्र दिल को ज़िंदा रखता है।
आप पढ़ सकती हैं:
- سُبْحَانَ اللّٰهِ
- الْحَمْدُ لِلّٰهِ
- اللّٰهُ أَكْبَرُ
- أَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ
- لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ
यह चलते-फिरते भी किया जा सकता है।
3. दरूद शरीफ़
नापाक हालत में दरूद शरीफ़ पढ़ना पूरी तरह जायज़ है।
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَعَلَىٰ آلِ مُحَمَّدٍ
जो मुझ पर एक दरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें भेजता है।
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4. क़ुरआन सुनना
नापाक हालत में:
- मोबाइल पर
- टीवी पर
- यूट्यूब पर
क़ुरआन सुनना जायज़ है।
बस छूकर पढ़ना मना है।
5. तौबा और इस्तिग़फ़ार
नापाक हालत में यह दुआ बहुत असरदार है:
اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
6. सदक़ा और नेकी
पैसे से या किसी की मदद करके भी सदक़ा दिया जा सकता है।
यह भी इबादत है।
7. इल्म हासिल करना
इस्लामी किताबें, हदीस का तर्जुमा और नसीहतें पढ़ना जायज़ है।
इल्म हासिल करना भी इबादत है।
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8. सब्र और शुक्र
हैज़ और निफ़ास में सब्र करना और अल्लाह का शुक्र अदा करना भी इबादत है।
नापाक हालत और रसूल ﷺ का अमल
रसूल ﷺ अपनी बीवियों से हैज़ में भी बात करते, उनके साथ बैठते और मोहब्बत करते थे।
इससे साफ़ पता चलता है कि नापाकी से औरत की क़ीमत कम नहीं होती।
समाज की सोच बनाम इस्लाम
समाज कहता है: “दूर रहो”
इस्लाम कहता है: “अल्लाह को याद रखो”
पाक होने के बाद क्या करें
हैज़ या निफ़ास खत्म होने के बाद:
- ग़ुस्ल करें
- नमाज़ शुरू करें
- अल्लाह का शुक्र अदा करें
आख़िरी पैग़ाम
अगर आप नापाक हालत में हैं और फिर भी अल्लाह को याद कर रही हैं, तो समझ लीजिए:
अल्लाह आपसे दूर नहीं है।
वह आपके दिल की हालत जानता है।
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